पिछले मास मुझे 21 वर्षों पश्चात, भारत के सबसे छोटे राज्य, पर सबसे ख़ूबसूरत राज्यों में से एक “गोआ” जाने का अवसर मिला। कोंकणी में गोआ को गोयं कहते हैं। ये तो आप सभी को मालूम ही है, कि गोआ की संस्कृति एक अलग अंदाज़ की है वो शायद इसीलिए की यहां पुर्तगाली शासकों ने लगभग 450 वर्षों तक राज किया और यहां की कला और संस्कृति पर हमेशा हमेशा के लिए एक अमिट छाप छोड़ दी। कहते हैं की गोआ का उल्लेख हमें महाभारत में भी मिलता है। उस समय इसे गोप राष्ट्र के नाम से जाना जाता था जिसका अर्थ है गाय चराने वाला देश। कई संस्कृतियां आईं और गयी पर मूल संस्कृति आज भी कायम है, और यही गोआ की ख़ूबसूरती में चार चांद लगाती है।
मेरा टैक्सी ड्राइवर एक ईसाई था जिसके दादा एक पुर्तगाली थे और उन्होंने स्थानीय ईसाई लड़की से शादी की थी। ड्राइवर साहब ने बताया की गोआ में हिंदुओं की आबादी कुल आबादी का कुल 60 प्रतिशत है, सुन कर थोड़ा अजीब लगा क्योंकि मुझे यही लगता था, की गोआ ईसाई बहुल राज्य है,पर ये मिथ्य है। गोआ की कुल आबादी लगभग 15 लाख है जिसमें से 60 प्रतिशत हिन्दू और 28 प्रतिशत ईसाई समुदाय से जुड़े लोग रहते हैं।
1961 में गोआ भारत गणराज्य का हिस्सा बना और वर्ष 1987 में ये भारत का 25वां राज्य बन गया इससे पहले ये दमन और दीव के साथ केंद्र शासित प्रदेश था। यहां के समुद्री तटों का नैसर्गिक सौंदर्य न केवल भारतीयों अपितु, लाखों अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों को भी खूब लुभाता है जो उन्हें यहां खींच कर ले आता है। यहां लगभग 40 बीच हैं जो अत्यंत सुंदर हैं और अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर काफी लोकप्रिय हैं, पर पर्यटकों को सबसे ज्यादा लुभाने वाले बीच हैं – कालंगुट जो राजधानी पणजी से 16 किलोमीटर की दूरी पर है, बागा, जुआरी नदी के किनारे बना-दोनपौला बीच (इसी बीच के पास ही राज भवन भी है) और अंजुना बीच। अक्टूबर से फरवरी तक का मौसम गोआ जाने के लिए सबसे मुसीद है। वैसे तो आजकल पूरे वर्ष ही यहां पर्यटकों का तांता लगा ही रहता है। गोआ दो जिलों में विभाजित है उत्तरी गोआ और दक्षिण गोआ। गोआ में कुछ ऐतिहासिक मंदिर और चर्च भी हैं और हाँ दूध सागर प्रपात भी अवश्य जाएं।
वर्ष 1998 में मुझे भी गोआ देखने की धुन सवार हुई। उस समय मेरी उम्र 23 वर्ष की थी और रेलवे में नौकरी करते हुए चार वर्ष सम्पूर्ण कर लिए थे। कोंकण रेलवे नया नया शुरू हुआ था। उस समय दिल्ली से केवल एक ही गाड़ी कोंकण होते हुए गोआ और फिर मंगलोर तक जाती थी, वैसे आज भी ये गाड़ी परिचालन में है और इसका नाम है “मंगला एक्सप्रेस”। हमने कोंकण रेलवे देखने का और इसी रूट से गोआ के नव निर्मित स्टेशन मडगांव पर जाने का मानस बनाया पर यहां एक पेच था वो ये की रेलवे के पासधारकों को यहां उतारना मना था। पर हमने जुगाड़ ढूंढ लिया और फिर क्या था अगले दो दिन हमने कलांगुट बीच पर गोआ टूरिज्म के होटल में समय व्यतीत किया।
ठीक 21 वर्ष मैं पुनः कालंगुट गया और विशेष तौर पर गोआ टूरिज्म के उसी होटल में और अपनी यादों को ताज़ा किया। लेकिन इस बार हम ठहरे कालंगुट में ही बने “चैलस्टेन” रिसोर्ट में। कई वर्षों बाद ऐसी प्रॉपर्टी में रुकने को मिला जहां से सुमद्र को निहारो, खाना खाओ और पूल में पड़े रहो, दुनिया की तमाम फ़िक्रों से दूर। रिसोर्ट ने दुनिया भुला दी। यहां की उत्कृष्ट सेवा ने हमारा प्रवास यादगार बना दिया।
स्वयं से वायदा किया है की अगले बार गोआ प्रवास यहीं करना है वो भी परिवार के साथ। आप जब भी गोआ जाएं तो वहां से काजू लाना मत भूलियेगा।