“मनोज मुंतशिर शुक्ला: लेखनी और ओजस्वी वाणी का मैं सदा क़ायल”

मनोज मुंतशिर शुक्ला की लेखनी और ओजस्वी वाणी का मैं सदा क़ायल रहा हूँ। पिछले दिनों जब मुलाक़ात हुई तो गले लग कर मिले और आनंद की अनुभूति हुई। उनकी नवीनतम कृति से एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ आशा है आपको भी पसंद आएगी।

                            मैं माँ के साथ रहता हूँ

सैकड़ों नंबर्स हैं मेरी फ़ोन-बुक में, तमाम रिश्ते हैं मेरे पास लेकिन दुनिया में हर किसी से फ़र्ज़ का रिश्ता है और माँ से दर्द का रिश्ता है।

यही एक रिश्ता है जिसका जोड़ इस धरा पर कोई नहीं, मेरी माँ के बराबर कोई नहीं!

मैंने पूरी जिंदगी न कोई व्रत किया, न उपवास रखा, फिर भी भगवान् मुझसे खुश है क्योंकि मैंने अपनी माँ को हमेशा अपने पास रखा।

मेरे दोस्त कहते हैं ‘तू बड़ा क़िस्मत वाला है तेरे घर में ममता की गंगा बहती है तेरी माँ तेरे साथ रहती है’

जो घर की नेम-प्लेट से धोखा खा गए कोई उनको कैसे समझाए, आज तक कोई बेटा इतना बड़ा नहीं हो पाया कि माँ को साथ रख पाए।

मैं किसी ग़लतफ़हमी में नहीं जीता हर दिन, हर रोज़ अपने आप से कहता हूँ, माँ मेरे साथ नहीं रहती, मैं माँ के साथ रहता हूँ।

जो मेरी नस-नस में है।

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